डुबो दी कश्तियाँ जिसने, ज़रा से कुछ इशारों पर॥ लहर बेजार अब वो , सर पटकती है किनारों पर॥ खुली जो आँख तो पाया ,की सूरज सर पे आ पहुंचा। बसा रक्खी थी ख्वाबो में, ये दुनिया चाँद तारो पर॥
ये दामन छोड़ कर पायेंगे क्या, हम फ़िर संभलने को। पड़ी ये बूँद है सहरा में , प्यासे बेसहारों पर॥ अमल
ग़ज़ल क्या है ,, ग़ज़ल का फ़न क्या है ,, चंद लफ्जों में जैसे आग छुपा दी जाए । निदा फाजली
कविता ,,जैसा मैंने पहले ही लिखा है ,,लिखी नही जाती ,, उतरती है ,,और जब भी उतरती है वोः बाध्य कर देती है अपने आपको कलमबद्ध होने के लिए ,, ये कविता ही है जो ख़ुद लिख रही है अपने आपको मुझे माध्यम बना कर ,,जिस भी तरह से आयी मैंने लिख दी ,, अच्छी या बहुत अच्छी आप जाने या रब जाने ।